श्री गुरु महाराज

अनन्त श्रीविभूषित इन्द्रप्रस्थ एवं हरियाणा पीठाधीश्वर स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज का प्रादुर्भाव 27 मई 1937 को राजस्थान की पावन अवनी में सवाई मण्डलान्तर्गत पाड़ला ग्राम में एक सम्पन्न कृषक ब्राह्मण परिवार में हुआ।

"बीरवान बलवान के होत चिकने पात" इस कहावत को सार्थक करते हुए अनन्त श्रीविभूषित इन्द्रप्रस्थ एवं हरियाणा पीठाधीश्वर स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज जो कि बहु मुखी प्रतिभा के धनी, धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत थे, उन्होंने सर्वप्रथम मेंहदी पुर बालाजी के प्रसिद्ध मंदिर के महन्त श्री गणेशपुरी का सान्निध्य प्राप्त कर मानव कल्याण की कामना से लोकहित कार्यो में अपना ध्यान लगाते हुए अपनी आध्यात्म पथ की यात्रा की शुरूआत की, तथा इसके बाद व्रज वसुन्धरा के पावन वृन्दावनधाम में खटलेश स्वामी गोविन्दाचार्य महाराज से दीक्षा एवं शिक्षा ग्रहण कर सारस्वत नगरी काशी में भी वेदादि शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।

"अनुभवग यभजहिंजेहिसन्ता" परमभक्त संत तुलसीदास के वचनों को हृदयंगम करते हुए भानगढ़ के बीहड जंगलों में बारह वर्षो तक कठोर तपस्या कर तन्त्र- मन्त्रों की प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त कर लोकोपकार करने के लिए सांसारिक जीवों के बीच में प्रकट हुए।

इसी परिवेष में अरावली पर्वत के उपत्यका पर फरीदाबाद मण्डलान्तर्गत तव्यास पहाड़ी के भूखण्ड पर सिद्धदाता आश्रम के निर्माण के लिए 1989 में कार्य प्रारंम्भ हुआ। इस भूखण्ड ग्रहण के विषय में एक रोचक किन्तु भावपूर्ण किंवदन्ती जुड़ी हुई है। फरीदाबाद से दिल्ली की ओर जाते समय अचानक गाड़ी रूकने के कारण जून के प्रचण्ड आतप मध्य दिन में महाराज जी को जल का चमकाता हुआ स्रोत दिखाई दिया। वाहन रोक कर निरीक्षण बुद्धि से देखने पर कुछ भी दिखाई नही दिया। परन्तु कुछ अव्यक्त वाणी सुनाई दी, जिसे प्रमाण मानकर उसी स्थान पर आश्रम बनाने की प्रेरणा ग्रहण कर उसे क्रियान्वित करने के लिए प्रारंभिक गतिरोध के बाद इस महान कार्य में सफल हुए और आश्रम निर्माण का कार्य सम्पन्न हुआ।

इसके बाद में भगवदाज्ञा को स्वीकार करते हुए श्रीलक्ष्मीनारायण दिव्यधाम निर्माण का कार्य 1996 के विजयादशमी के पावन पर्व पर आरम्भ किया गया। प्रारंभिक गतिरोध के बाद इस कार्य में भी वे सफल हुए और आश्रम निर्माण का कार्य सम्पन्न हुआ। महाराज जी के अहर्निश अनथक परिश्रम, भक्तजनों के द्वारा की गई कार सेवा के परिणामस्वरूप चार वर्ष के अत्यल्प समय में ऐसे तीर्थ स्थल का निर्माण किया, जिसके दर्शन से अनन्त काल तक श्रद्धालु भक्त लोग पुण्य लाभ प्राप्त कर जीवन सफल बनाते रहेंगे। यहां पर समस्त भक्तजनों की श्रद्धानुसार सभी मनोकामनाएँ धर्म, अर्थ; काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है।

महाराज जी के विलक्षण वैभव व गुणों से प्रभावित होकर वैष्णव समुदाय ने 1998 के हरिद्वार के महाकुम्भ में पतित पावनी गंगा जी के किनारे जगद्गुरुओं, पीठाधीश्वरो, त्रिदण्डी स्वामियों एवं आचार्यो तथा समस्त वैष्णव समुदाय के समक्ष आपको श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य के पद पर विभूषित कर, इस पद की गरिमा को भी सम्मानित किया।

अपने जीवन काल में ही 23 अप्रैल 2007 को अनेक संतों, महन्तों एवं भगवद्भक्तों के समक्ष अपने उत्तराधिकारी स्वामी पुरूषोत्तमाचार्य जी को पद पर अभिषेक कर सांसारिक उत्तरदायित्वों एवं सिद्धदाता आश्रम के कार्य भार से मुक्त हो गये तथा 22 मई 2007 के मध्यान्ह काल अभिजित नक्षत्र के शुभ समय में सूर्यांश को ग्रहण कर इस नश्वर शरीर को त्याग कर वैकुण्ठवास कर गए।

पूज्य महाराजश्री के जीवन दर्शनों में बहु आयामों की विशद व्याख्या प्रस्तुत की गई है जिनमें नामजप, शरणागति, मानवता और लोक सेवा प्रधान रूप से दिखाई देते हैं। गुरुजी ने नाम-ग्रहण करने; दान देने और शरणागति को सर्वापरि सिद्धान्त मानकर अपने दिव्य अमृतमय संत्सगों के द्वारा जनमानस में समारोपित करने का अनथक प्रयास किया। दिव्य शक्तियों के प्रयोग से समस्याओं का समाधान एवं प्रत्यक्ष अनुभूति के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं।

भक्तों, सज्जन पुरूषों, आगन्तुकों एवं जन मानसों के अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पूज्य गुरु महाराज श्री सिद्धदाता आश्रम के कण-कण में, वृक्षों लता-वितानों में, आश्रम वासियों के हृदय में अनन्त रूप से विद्यमान हैं। भक्तों, शिष्यों, पीड़ितों के कष्टों को दूर कर इन्हें अध्यात्म ज्ञान की पावन सरिता में निंरतर अवगाहन कराते हैं। साथ ही निरन्तर मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हुए वह भगवद्भक्तों के हृदय में नित्य विराजमान है, तथा लक्ष्मी नारायण धाम के कण-कण में इस अनुभूति को वहां आने वाले भगवत प्रेमियों को प्राप्त किया जाता है।

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