भक्तों के चमत्कारिक अनुभव

मोनेष एइदासनी, दुबई, यूएई

अपने गुरूजी के एक ओर चमत्कार को लिखते हुए मेरे शरीर में रोमांच पैदा हो रहा है। मैं यह अवश्य कहूंगा कि हर बार परेशानी के दौर से मुझे बाहर निकालने के लिए मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं। और यह सब कुछ उन्होंने बिना किसी छोटी सी भी परेशानी से संभव कर दिखाया है!

यह घटना सितम्बर 2005 की है, जैसे ही मैं दोपहर का भोजन करने बैठा, मुझे मेरे कार्यालय से एक टेलीफोन काल प्राप्त हुई। मुझे उन्होने यह सूचित किया कि सरकारी कार्यालय से एक प्रतिनिधि मेरे कार्यालय में आया है जिसके पास मेरा बिजनेस कार्ड है तथा वह मेरे एच आर अधिकारी से मिलने के लिए कह रहा है, कि यह व्यक्ति यहां कैसे काम कर सकता है? एच आर अधिकारी द्वारा और अधिक प्रश्न पूछने पर, अधिकारी ने यह बताया कि मेरी पिछली कम्पनी, जहां से मैं लगभग डेढ़ साल पहले काम छोड़ आया हूं, उन्होंने मेरे विरूद्ध लेबर आफिस में एक शिकायत दर्ज की है, कि मैं एक प्रतिस्पर्धी के लिए काम कर रहा हूं। मेरी पिछली कम्पनी ने एक आधिकारिक संविदा पर मेरे इस हस्ताक्षर लिए थे जिसमें उसने हाथ से एक छोटी सी लाइन जोड़ दी थी कि मैं अगले दो वर्षों के लिए कम्पनी के प्रतिस्पर्धी के साथ काम नहीं करूंगा। मुझे इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी, तथा मुझे इससे बहुत अधिक आश्चर्य भी हुआ। यह मेरे लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था और वह भी 1 -1/2 वर्ष के बाद ऐसा अचानक से हुआ। मैं अपना भोजन भी नहीं निगल पा रहा था, तथा उसने कहा की मुझे अपना वीजा रद्द करवाना होगा और यूएई से लौटना होगा।

इसके बाद मैंने सरकारी कार्यालय के अनेक चक्कर लगाए जहां पर मेरी मुलाकात पिछली कम्पनी के पीआरओ से हुई। उसने मुझे यह बताया कि मैंने प्रतिस्पर्धी कम्पनी के साथ काम करके कितनी बड़ी गलती की है। इसी दौरान मैंने गोविन्द अंकल से बात की तथा अंकल इतने शांत थे कि उन्होने मुझे कहा ठीक है कुछ नहीं होगा। मैंने अंकल को बताया कि यह विषय बहुत ही गंभीर है कि मुझे देश छोड़ना पड़ सकता है। स्पष्ट है कि उन्हें मालूम था कि क्या होने वाला है और उन्होने कहा की चिंता की कोई बात नहीं है।

मुझे बुधवार को समन प्राप्त हुए जिसमें मुझसे शनिवार को न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा गया था। मैं शनिवार को जाने के लिए तैयार नहीं था, और समन से बचने के लिए मैं अपनी वार्षिक छुट्टियों के लिए बृहस्पतिवार को ही भारत लौट आया।

मैं सीधा दिल्ली वाले आश्रम में गया और गुरूजी के सामने सिर झुका कर खड़ा हो गया। उस समय मैंने गुरूजी से कहा कि आप कुछ भी करों लेकिन मुझे शर्मिंदगी से बचा लेना।

आश्रम में जाने के बाद मैं थोड़ा शांत हुआ तथा मुझ में यह विश्वास जगा कि जो कुछ भी होगा, गुरूजी हैं जो संभाल लेंगे। मुझे उन लोगों से कुछ कॉल प्राप्त हुईं। यहां तक कि मैं एक बार उस सरकारी कार्यालय में भी गया जहां पर उन्होंने मुझे वीजा रद्द करवाने के लिए जाने के लिए कहा था। अब मैं काफी सहज हो चुका था और मुझ में विश्वास भी जाग गया था। लेकिन, जैसाकि की कहा जाता है कि गुरूजी कभी भी अपने भक्त की हानि नहीं होने देते हैं, वही दिन था जब मुझे उन लोगों ने आखिरी बार संपर्क किया था।

वास्तव में, मेरे कुछ पुराने सहकर्मियों ने मुझे बताया कि जब सरकारी कार्यालय में इस बात की जांच की गई तो उन्हें बस इतना ही पता चला कि मैं यूएई में नहीं हूं और मैं देश छोड़ चुका हूं !!!

मैं यह सब कुछ सुन कर भौंचक्का रह गया कि वे क्या बात कर रहे हैं। मेरी मुस्कुराहट के साथ ही मेरे दिलो दिमाग में गुरूजी की तस्वीर आने लगी कि गुरूजी लेबर कार्यालय जा रहे हैं और उनके सिस्टम में मेरे स्टेट्स को बदल रहे हैं तथा मैं अपनी मुस्कुराहट को नहीं रोक पाया।

जय जय जय गुरूदेव ....



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